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ॐ
श्री सद्गुरुदेवाय नम:  |  श्री कृष्णार्पणमस्तु

श्री गुरु चालीसा

गुरु ब्रह्मा गुरु विष्णु गुरु देवो महेश्वर।
गुरु साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः।।
॥ दोहा ॥
गुरु चरणन का ध्यान धर, करूँ मैं गुरु यश गान। गुरु आशिष ही लेखनी, गुरु कृपा ही ज्ञान॥ नहीं बुद्धि नहीं विद्या, नहीं विवेक नहीं ज्ञान। बरनूँ सतगुरु विमल यश, भवसागर जलयान॥

॥ चौपाई ॥

ब्रह्मरूप गुरु अन्तर्यामी। तीनों लोक के आप स्वामी॥ गुरु की महिमा अपरम्पार। पा न सके कोई जिसको पार॥
नेति-नेति जेहि वेद बतावे। सगुण रूप सतगुरु कहलावे॥ सतगुरु पूर्ण दीन दयाला। सदा रहे भक्तन प्रतिपाला॥
गुरु कृपा से पावे ज्ञान। जिस से मिटता मोह अज्ञान॥ गुरु कृपा से मुक्ति पावे। पूर्ण सतगुरु भेद बतावे॥
जो सतगुरु की शरणी आवे। जन्म मरण का रोग मिटावे॥ गुरु भक्ति भिलनी मन भाई। राम दरस से मुक्ति पाई॥
गुरु वचन का दृढ़ विश्वास। पूर्ण हो गई उसकी आस॥ गुरु निष्ठा एकलव्य कीन्ही। गुरु मूरत से शिक्षा लीन्ही॥
अर्जुन का अभिमान गिराया। गुरु भक्तों में नाम है पाया॥ गुरु दशमेश का भक्त कन्हैया। सतगुरु पार लगाई नैया॥
ऐसी कृपा सतगुरु कीन्ही। बख्शिश में सम दृष्टि दीन्ही॥ हर में रूप गुरु का देखा। मिट गया जनम-मरण का लेखा॥
गुरु नानक का सेवक लैहणा। सेवक लैहणा सतगुरु देना॥ गुरु हुकम से सेवा कमाई। गुरु अंगद की पदवी पाई॥
गुरु की महिमा बड़ी अनूप। दे देते हैं अपना रूप॥ गुरु नारद उपदेश जो दीन्हा। पार्वती ने उर धर लीन्हा॥
घोर तपस्या का फल पाया। शिव शम्भु वर उसने पाया॥ अमर कथा जब शम्भु बखानी। गुरु कृपा भाई अमर भवानी॥
जिसने ध्याया उसने पाया। सतगुरु तेरी अद्भुत माया॥ गुरु के भाव मन में लावो। घट गुरु भीतर दर्शन पावो॥
गुरु चरणों में शीश झुकावो। चार पदार्थ गुरु से पावो॥ गुरु के वचन हुकम कर मानो। सकल मनोरथ पूर्ण जानो॥
गुरु की कृपा विरति जोड़े। आवागमन के बन्धन तोड़े॥ नैनन से गुरु दर्शन कीजे। कान सफल वाणी से कीजे॥
मुख से जपिये गुरु का नाम। सफल होवे तेरा पूर्ण काम॥ हाथों से करो गुरु की सेवा। सेवा से मिलती है मेवा॥
श्वास श्वास करो गुरु की पूजा। एहि सम उत्तम कर्म न दूजा॥ सकल देव करें गुरु में वास। बन जा गुरु चरणों का दास॥
गुरु दृष्टि से परम गति होय। गुरु बिन ज्ञान न पावे कोय॥ राम कृष्ण जो थे भगवान। गुरु चरणों में पाया ज्ञान॥
गुरु बिन मार्ग कौन दिखावे। गुरु ही पर्दा दूर हटावे॥ गुरु से पाइये सच्चा प्यार। गुरु से मिलता मोक्ष द्वार॥
अन्त समय जो गुरु को ध्याता। यम न खोले उसका खाता॥ उसका लेखा गुरु के हाथ। पग पग देता सतगुरु साथ॥
बाँह पकड़ गुरु पार लगावे। गुरु का सेवक क्यों घबरावे॥ अहंकार न आवे पास। बनकर रहिये गुरु के दास॥
नित उठ ध्यान गुरु का कीजे। तन मन धन अब अर्पण कीजे॥ पाठ करे जो गुरु चालीसा। उसको आन मिले जगदीशा॥
॥ दोहा ॥
गुरु की कीजे वन्दना, चरण कमल चित लाये। विमल ज्ञान को पाइये, अन्त मुक्त हो जाये॥ विवेक ज्ञान की धार से, काटे सतगुरु फन्द। जीवन कटे प्यार से, पावे परमानन्द॥