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ॐ

श्रीसद्गुरुदेवाय नमः  ·  ॐ श्रियै नमः  ·  श्रीराधाकृष्णाभ्यां नमः

तप्तकाञ्चन गौरांगि राधे वृन्दावनेश्वरि।
वृषभानुसुते देवि त्वां नमामि हरि प्रिये॥

श्री राधा-कृष्ण
कृपाकटाक्ष स्तोत्र एवं कवच

(श्रीराधा-कृष्ण एवं श्रीगुरु चालीसा सहित)

श्री राधा-कृष्ण

न्योछावर : श्रद्धा एवं मनन पूर्वक पाठ

अपने परम पूज्य सतगुरुदेव श्रीगार्ड साहिब जी महाराज तथा
अपने सर्वस्व प्रभु श्रीश्रीराधाकृष्ण महाराज जी के अत्यन्त ही पावन
श्रीचरणकमलों का ......... कोई ......... एक ......... किंकर।

दोहा
काहू के बल भजन है, काहू के आचार।
व्यास भरोसे कुँवरि के, सोवत पाँव पसार॥
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॥ श्रीगुरु स्तुति ॥
गुरु चरणों में नमन, करूँ मैं दो कर जोरि।
हृदय मेरे आ बसो, एक टेक है तोरि॥
गुरु की मूरत ध्यान कर, गुरु का शब्द उच्चार।
गुरु कृपा से पाइए सहज ही मोक्ष द्वार॥
श्वास श्वास विनती करूँ, चरण कमल चित्त लाए।
काम क्रोध मद लोभ मोह, मन को न भरमाए॥
गुरु की कीजे वंदना, नख शिख बारंबार।
जग तारन हेतु के, जिस ने लिया अवतार॥
गुरु चरणों की सेवा, करे जो चित्त लाए।
गुरु नाम नाव से, सहज पार हो जाए॥
गुरु पद रज अञ्जन समझ, जी नैनन लगाए।
मोह कलुष सब दूर हो, दिव्य दृष्टि हो जाए॥
निज सेवक के सदा, गुरु रहे अससंग।
गुरु कृपा से पाइए, पूर्ण परमानंद॥
॥ श्री राधा चालीसा ॥
दोहा
श्रीराधे वृषभानुजा, भक्तनि प्राणाधार।
वृन्दाविपिन विहारिणी प्रणवौं बारंबार॥
जैसो तैसो रावरो कृष्ण प्रिया सुख धाम।
चरण शरण निजु दीजिये सुन्दर सुखद ललाम॥
✦ ✦ ✦
1जय वृषभानु कुंवरि श्री श्यामा।
कीरति नंदिनि शोभा धामा॥
2नित्य विहारिणि श्याम अधारा।
अमित मोद मंगल दातारा॥
3रास विलासिनि रस विस्तारिनि।
सहचरि सुभग यूथ मन भावनि॥
4नित्य किशोरी राधा गोरी।
श्याम प्राणधन अति जिय भोरी॥
5करुणा सागर हिय उमंगिनी।
ललिताऽदिक सखियन की संगिनी॥
6दिनकर कन्या कूल विहारिनि।
कृष्ण प्राण प्रिय हिय हुलसावनि॥
7नित्य श्याम तुम्हरौ गुण गावें।
राधा राधा कहि हर्षावें॥
8मुरली में नित नाम उचारें।
रव कारण लीला वपु धारें॥
9प्रेम स्वरूपिणि अति सुकुमारी।
श्याम प्रिया वृषभानु दुलारी॥
10नवल किशोरी अति छवि धामा।
द्युति लघु लगै कोटि रति कामा॥
11गौरांगी शशि निंदक बदना।
सुभग चपल अनियारे नयना॥
12जाकयुत युग पंकज चरणा।
नूपुर धुनि पीतम मन हरणा॥
13सतत सहचरि सेवा करहीं।
महा मोद मंगल मन भरहीं॥
14रसिकन जीवन प्राण अधारा।
राधा नाम सकल सुख सारा॥
15अगम अगोचर नित्य स्वरूपा।
ध्यान धरत निशिदिन बृजभूपा॥
16उपजेउ जासु अंश गुण खानी।
कोटिन उमा रमा ब्रह्माणी॥
17नित्य धाम गोलोक विहारिनी।
जन रक्षक दुःख दोष नसावनि॥
18शिव अज मुनि सनकादिक नारद।
पार न पाँइ शेष अऋ सारद॥
19राधा शुभ गुण रूप उजारी।
निरखि प्रसन्न होत बनवारी॥
20बृज जीवन धन राधारानी।
महिमा अमित न जाय बखानी॥
21पीतम संग देइ गलबाँही।
बिहरत नित वृन्दावन माँही॥
22राधा कृष्ण कृष्ण है राधा।
एक रूप दोउ प्रीति अगाधा॥
23श्री राधा मोहन मन हरनी।
जन सुखदायक प्रफुलित बदनी॥
24कोटिक रूप धरें नन्द नंदा।
दर्शन करन हित गोकुल चंदा॥
25राधा त्यागि कृष्ण को भजिहैं।
ते सपनेहु जग जलधि न तरिहैं॥
26कीरति कुंवरि लाड़िली राधा।
सुमिरत सकल मिटहिं भवबाधा॥
27नाम अमंगल मूल नसावन।
त्रिविध ताप हर हरि मन भावन॥
28राधा नाम लेइ जो कोई।
सहजहिं दामोदर बस होई॥
29राधा नाम परम सुखदाई।
भजतहिं कृपा करहिं यदुराई॥
30यशुमति नन्दन पीछे फिरिहैं।
जो कोउ राधा नाम सुमिरिहैं॥
31रासबिहारिनी श्यामा प्यारी।
करहु कृपा बरसाने वारी॥
32वृन्दावन है शरण तुम्हारी।
जय जय जय वृषभानु दुलारी॥
दोहा
श्रीराधा रासेश्वरी, रसिकेश्वर घन श्याम।
करहूँ निरंतर वास मैं, श्री वृन्दावन धाम॥
॥ श्रीराधाकृपाकटाक्ष स्तोत्र ॥
॥ श्रीश्रीराधाकृष्णाभ्यां नमः ॥
ध्यान
श्यामां गोरोचनाभां स्फुरदसितपट-प्राप्तिरम्यावगुण्ठां।
रम्यां धन्यांस्व वेणीसुचिकुरनिकरालंब पादां किशोरीम्॥
तर्जन्यंगुष्ठयुक्तां हरिमुखकुहरे युञ्जतीं नागवल्ली-
पर्णं कर्णायताक्षीं त्रिभुवनमधुरां राधिकां भावयामि॥
भावार्थ
जो नव तरुणी, गोरोचन-कान्तिशालिनी हैं, जिन्होंने नीलवर्ण की रेशमी ओढ़नी से मनोहर घूँघट लगा रखा है, एवं जिनकी घुँघराले स्निग्ध केशकलापों की गुंथी विशाल वेणी पीछे चरणों तक लटक कर धन्य-धन्य हो रही है, जो तर्जनी अंगुली एवं अंगूठे में धारण किये हुए ताम्बूल को प्रियतम श्रीकृष्ण के मुख में अर्पण कर रही हैं, कानों तक विस्तृत विशाल लोचना, त्रिभुवन मनहारिणी किशोरी श्रीराधिकाजी का मैं ध्यान करता हूँ॥
✦ ✦ ✦
श्रीशिव उवाच — श्लोक १
मुनीन्द्रवृन्दवन्दिते त्रिलोकशोकहारिणि।
प्रसन्नवक्त्रपंकजे निकुञ्ज-भू-विलासिनि॥
व्रजेन्द्र-भानुनन्दिनि व्रजेन्द्रसूनु-संगते।
कदा करिष्यसीह मां कृपाकटाक्ष भाजनम्॥
भावार्थ
मुनीन्द्र वृन्द जिनके चरणों की वंदना करते हैं तथा जो तीनों लोकों का शोक दूर करने वाली हैं, मुसकान युक्त प्रफुल्लित मुख-कमल वाली, निकुञ्ज-भवन में विलास करने वाली, राजा वृषभानु की राजकुमारी, श्रीब्रजराजकुमार की हृदयेश्वरी श्रीराधिके! कब मुझे अपने कृपा कटाक्ष का पात्र बनाओगी॥ १॥
श्लोक २
अशोक-वृक्ष-वल्लरी विताण-मण्डप-स्थिते।
प्रवाल-ज्वाल-पल्लव प्रभाऽरुणांघ्रि-कोमले॥
वराभयस्फुरत्करे प्रभूतसम्पदालये।
कदा करिष्यसीह मां कृपाकटाक्ष-भाजनम्॥
भावार्थ
अशोक की वृक्ष लताओं से बने हुए सिलतामन्दिरपि में विराजमान और मूँगे अग्नि तथा नवीन लाल-लाल पल्लवों के समान अरुण कान्ति युक्त कोमल चरणों वाली, भक्तों को अभीष्ट वरदान देने तथा अभय दान देने के लिए उत्सुक रहने वाले कर-कमलों वाली, अपार ऐश्वर्य की आलय स्वामिनि श्रीराधे मुझे कब अपने कृपा कटाक्ष का अधिकारी बनाओगी॥ २॥
श्लोक ३
अनंग-रंग-मंगल-प्रसंग-भंगुरभ्रुवां।
सविभ्रमं ससंभ्रमं दृगन्त-बाण पातनै॥
निरंतरं वशीकृत-प्रतीत नंदनन्दने।
कदा करिष्यसीह मां कृपाकटाक्ष-भाजनम्॥
भावार्थ
प्रेम क्रीड़ा के रंगमंच पर मंगलमय प्रसंग में बाँकी भ्रुकुटी करके, आश्चर्य उत्पन्न करते हुए सहसा कटाक्ष रूपी वाणों की वर्षा से श्रीनन्दनन्दन को निरन्तर बस में करने वाली हे सर्वेश्वरि! अपने कृपा कटाक्ष का पात्र मुझे कब बनाओगी॥ ३॥
श्लोक ४
तडित्-सुवर्ण-चम्पक-प्रदीप्त-गौर-विग्रहे।
मुख-प्रभा-परास्त-कोटि-शारदेन्दुमण्डले॥
विचित्र-चित्र-सञ्चरच्चकोर-शावलोचने।
कदा करिष्यसीह मां कृपाकटाक्ष-भाजनम्॥
भावार्थ
बिजली, स्वर्ण तथा चम्पा के पुष्प के समान सुनहरी कान्ति से देदीप्यमान गोरे अंगों वाली, अपने मुखारविंद की चाँदनी से करोड़ों शरच्चंन्द्रों को जीतने वाली, क्षण-क्षण में विचित्र चित्रों की छटा दिखाने वाले चंचल चकोर के बच्चे के सदृश विलोचनों वाली, हे जगजननि! क्या कभी मुझे अपने कृपा दृष्टि से कृतार्थ करोगी॥ ४॥
श्लोक ५
मदोन्मदाति-यौवने प्रमोद-मान-मण्डिते।
प्रियानुराग रञ्जिते कला-विलास-पण्डिते॥
अनन्य धन्य कुञ्जराज्य कामकेलि कोविदे।
कदा करिष्यसीह मां कृपाकटाक्ष-भाजनम्॥
श्लोक ६
अशेष-हाव-भाव-धीर हीरहार भूषिते।
प्रभूतशातकुम्भ-कुम्भ कुम्भि कुम्भ सुस्तनि॥
प्रशस्त मन्दहास्यचूर्ण पूर्ण सौख्यसागरे।
कदा करिष्यसीह मां कृपाकटाक्ष-भाजनम्॥
श्लोक ७
मृणाल-बाल-वल्लरी-तरंग-रंग-दोर्लते।
लताग्र लास्य लोल नील-लोचनावलोकने॥
ललल्लुलन्मिलन्मनोज्ञ मुग्ध मोहनाश्रये।
कदा करिष्यसीह मां कृपाकटाक्ष-भाजनम्॥
श्लोक ८
सुवर्ण-मालिकाञ्चित-त्रिरेख-कम्बु-कण्ठगे।
त्रिसूत्र-मंगलीगुण-त्रिरत्न-दीप्ति दीधिति॥
सलोल-नीलकुन्तल-प्रसून-गुच्छ-गुम्फिते।
कदा करिष्यसीह मां कृपाकटाक्ष-भाजनम्॥
श्लोक ९
नितम्बबिम्ब-लम्बमान-पुष्पमेखलागुणे।
प्रशस्तरत्न-किंकिणी कलापमध्य मञ्जुले॥
करीन्द्रशुण्ड दण्डिका वरोहसौभगोरुके।
कदा करिष्यसीह मां कृपाकटाक्ष-भाजनम्॥
श्लोक १०
अनेक मन्त्रनाद-मञ्जु नूपुरारवस्खलत्।
समाज राजहंस-वंश-निक्वणातिगौरवे॥
विलोलहेम वल्लरी विडम्बिचारु-चक्रमे।
कदा करिष्यसीह मां कृपाकटाक्ष-भाजनम्॥
श्लोक ११
अनन्त कोटि विष्णुलोक नम्र-पद्मजार्चिते।
हिमाद्रिजा-पुलोमजा-विरञ्चिजा-वरप्रदे॥
अपार सिद्धि वृद्धि दिग्ध सत्पदांगुलीनखे।
कदा करिष्यसीह मां कृपाकटाक्ष-भाजनम्॥
श्लोक १२
मखेश्वरि क्रियेश्वरि स्वधेश्वरि सुरेश्वरि।
त्रिवेद-भारतीश्वरि प्रमाण-शासनेश्वरि॥
रमेश्वरि क्षमेश्वरि प्रमोद-काननेश्वरि।
व्रजेश्वरि व्रजाधिपे श्रीराधिके नमोऽस्तु ते॥
श्लोक १३-१४ (फलश्रुति)
इतीदमद्भुतं स्तवं निशम्य भानुनन्दिनी।
करोतु सततं जनं कृपाकटाक्ष-भाजनम्॥
भवेत्तदैव संचित त्रिरूप-कर्म-नाशनं।
भवेत्तदा व्रजेन्द्रसूनु मण्डल-प्रवेशनम्॥
भावार्थ
हे वृषभानु नन्दिनि! इस विचित्र स्तुति को सुनकर सर्वदा के लिए मुझ दास को अपनी दया दृष्टि का अधिकारी बनालो। बस आपकी दया ही से तो मेरे (प्रारब्ध, संचित और क्रियमाण) इन तीनों प्रकार के कर्मों का नाश हो जायेगा और उसी क्षण श्रीकृष्णचन्द्र के नित्य मण्डल (दिव्यधाम की लीलाओं में) सदा के लिए प्रवेश हो जायेगा॥ १३-१४॥
श्लोक १५-१६ (पाठ विधि)
राकायां च सिताष्टम्यां दशम्यां च विशुद्धधीः।
एकादश्यां त्रयोदश्यां यः पठेत्साधकः सुधीः॥
यं यं कामयते कामं तं तं प्राप्नोति साधकः।
राधाकृपाकटाक्षेण भक्तिः स्यात् प्रेमलक्षणा॥
श्लोक १७-२० (राधाकुण्ड विधि)
उरुमात्रे नाभिमात्रे हृन्मात्रे कण्ठमात्रके।
राधाकुण्डजले स्थित्वा यः पठेत् साधकः शतम्॥
तस्य सर्वार्थसिद्धिः स्यात् वाञ्छितार्थं फलं लभेत्।
ऐश्वर्यं च लभेत् साक्षाद्दृशा पश्यति राधिकाम्॥
तेन सा तत्क्षणादेव तुष्टा दत्ते महावरम्।
येन पश्यति नेत्राभ्यां तत् प्रियं श्यामसुन्दरम्॥
नित्यलीला-प्रवेशं च ददाति हि व्रजाधिपः।
अतः परतरं प्राप्यं वैष्णवानां न विद्यते॥
भावार्थ
इस स्तोत्र से श्रीराधाकृष्ण का साक्षात्कार होता है। उसकी विधि इस प्रकार है कि (गोवर्धन पर्वत के निकट) श्रीराधाकुण्ड के जल में जंघाओं तक या नाभि पर्यंत या छाती तक या कण्ठ तक जल में खड़े होकर इस स्तोत्र का १०० बार पाठ करें। इस प्रकार कुछ दिन पाठ करने पर सम्पूर्ण मनोवांछित पदार्थ प्राप्त हो जाते हैं।
इति उर्ध्वाम्नायतन्त्रे शिवगौरीसंवादे
श्रीराधाकृपाकटाक्षस्तवराजः सम्पूर्णः॥
तवैवास्मि तवैवास्मि, न जीवामि त्वया विना।
इति विज्ञाय देवि! त्वं, नय मां चरणान्तिकम्॥
(विलाप कुसुमाञ्जलि ९७)
॥ कृष्ण प्रेमम्यी राधा, राधा प्रेमम्यो हरिः ॥
॥ श्री राधा-कवच ॥
पार्वत्युवाच
कैलासवासिन् भगवन् भक्तानुग्रहकारक।
राधिकाकवचं पुण्यं कथयस्व मम प्रभो॥
यद्यस्ति करुणा नाथ त्राहि मां दुःखतो भयात्।
त्वमेव शरणं नाथ शूलपाणे! पिनाकधृक्॥
शिव उवाच — श्लोक ३-४
शृणुष्व गिरिजे तुभ्यं कवचं पूर्व सूचितम्।
सर्वरक्षाकरं पुण्यं सर्वहत्या-हरं परम्॥
हरिभक्तिप्रदं साक्षात् भुक्तिमुक्तिप्रसाधनम्।
त्रैलोक्याकर्षणं देवि हरिसान्निध्यकारकम्॥
श्रीराधा मे शिरःपातु ललाटं राधिका तथा॥ ९॥
श्रीमती नेत्र-युगलं कणौ गोपेन्द्रनन्दिनी॥
हरिप्रिया नासिकां च भ्रूयुगं शशिशोभना॥ १०॥
ओष्ठं पातु कृपादेवी अधरं गोपिका तथा॥
वृषभानुसुता दन्ताशिचबुकं गोपनन्दिनी॥ ११॥
चन्द्रावली पातु गण्डं जिह्वां कृष्णप्रिया तथा॥
कण्ठं पातु हरिप्राणा हृदयं विजया तथा॥ १२॥
बाहू द्वौ चन्द्रवदना उदरं श्रीदाम्नःस्वसा॥
कटिं योगान्विता पातु पादौ सौभद्रिका तथा॥ १३॥
नखान् चन्द्रमुखी पातु गुल्फौ गोपालवल्लभा॥
जानुदेशं जया पातु गोपी पादतलं तथा॥ १४॥
शुभप्रदा पातु पृष्ठं कुक्षी श्रीकान्तवल्लभा॥
जानुदेशं जया पातु हरिणी पातु सर्वतः॥ १५॥
वाक्यं वाणी सदा पातु धनागारं धनेश्वरी॥
पूर्वादिशं कृष्णरता कृष्णप्राणा च पश्चिमे॥ १६॥
उत्तरां हरिता पातु दक्षिणां वृषभानुजा॥
चन्द्रावली निशैव दिवा क्षेडितमेखला॥ १७॥
सर्वदा सर्वकार्येषु राधिका कृष्ण-मानसा॥
इत्येतत्कथितं देवि कवचं परमाद्भुतम्॥ २१॥
सर्वरक्षाकरं नाम महारक्षा करं परम्।
प्रातर्मध्याह्न-समये सायाह्ने प्रपठेद्यदि॥ २२॥
श्रीनारदपञ्चरात्र ज्ञानामृतसारोद्धत पाँचवें रात्र के सातवें अध्याय में वर्णित
'सर्वरक्षाकरं श्रीराधाकवच' की भाषा-टीका सम्पूर्ण हुई॥
॥ श्रीकृष्ण चालीसा ॥
मंगलाचरण — दोहा
जय श्रीकृष्ण दयालु भगवन, जय जय प्राणाधार।
अजर, अमर, अविनाशी हो तुम, पूर्ण ब्रह्म अवतार॥
सभी देवों के आदि कारण, सकल विश्व आधार।
तेरी महिमा कोई न जाने, मेरे कृष्ण मुरार॥
अनादि, अनन्त, अजन्मा स्वामी, जय जय बख्शनहार।
ऐसी दृष्टि दास पे बख्शो, मिट जायें सभी विकार॥
✦ ✦ ✦
1जय श्रीकृष्ण गुणों के सागर।
सभी लोक तुम करो उजागर॥
2जय वसुदेव देवकी नंदन।
मात यशोधा और नन्द नंदन॥
3जय बंसीधर जय भगवंता।
तीन लोक के हो तुम कंता॥
4जय मन मोहन कृष्ण मुरारे।
तू ने सारे असुर संहारे॥
5जय जय तेरी दीन दयाला।
करुणा-सिन्धु अति कृपाला॥
6जय माधव पीताम्बर धारी।
जय केशव जय जय बनवारी॥
7जय नटवर गोवर्धन धारी।
कौरव दल और कंस संहारी॥
8बाँके बिहारी जय गिरिधारी।
जय घनश्याम सुदर्शन धारी॥
9मुरली मनोहर असुर निकंदन।
जय राधा वर जय बृज चंदन॥
10भक्त वत्सल श्याम मुरारे।
गोपियों के तुम प्राण आधारे॥
11जय हो मेरे कुँवर कन्हैया।
जय हलधर के प्यारे भैया॥
12गोपों के तुम सदा सहाई।
तेरी लीला लखी न जाई॥
13साँवरे गिरिधर मदन गोपाला।
सारे जग के हो प्रतिपाला॥
14सभी देवों के आदि कारण।
केवल तुम हो जग के तारण॥
15तू निराकार तू ही साकारा।
सकल विश्व तेरे आधारा॥
16सभी कला सम्पूर्ण स्वामी।
तेरी महिमा किसी न जानी॥
17पूर्ण ब्रह्म जगदीश्वर स्वामी।
घट घट के हो अन्तर्यामी॥
18ऋषि मुनि तेरा यश गावें।
तेरे दर पर शीश झुकावें॥
19मैं भी वंदना करूँ मुरारी।
श्यामवर्ण साधु हितकारी॥
20नमस्कार गोवर्धन धारी।
वृन्दावन के रास विहारी॥
21नमस्कार श्री दीना बन्धु।
कमल नयन और करुणा-सिन्धु॥
22नमस्कार जग के पत वन्ता।
दीना नाथ सच्चे भगवंता॥
23नमस्कार चहूँ ओर से स्वामी।
जगन्नाथ और अन्तर्यामी॥
24नमस्कार सत् चित आनंद।
दीन दयालु आनंद कंद॥
25नमस्कार मुक्ति के दाता।
हे बृज रसिया जग के त्राता॥
26नमस्कार अजन्म अनंता।
विश्वम्भर त्रिभुवन के कंता॥
27नमस्कार त्रैकालिक नाथ।
द्वारकाधीश त्रिलोकी नाथ॥
28नमस्कार पीताम्बर धारी।
प्रणतपाल और असुरारी॥
29नमस्कार करोड़ों स्वामी।
रोम रोम और दिल से स्वामी॥
30नमस्कार यह दास की सादर।
करो स्वीकार प्रभु गुण-सागर॥
31हे बृज-भूषण नन्द दुलारे।
सूरदास के अति प्यारे॥
32ध्रुव ने तेरी महिमा गाई।
अटल पदवी उस ने पाई॥
33भक्त प्रह्लद ने तुम्हें पुकारा।
नर सिंह रूप हो पापी मारा॥
34द्रोपदी पर जब विपदा आई।
चीर बढ़ा कर हुए सहाई॥
35नरसी भक्त की हुण्डी तारी।
जय मधुसूदन जय असुरारी॥
36साग विदुर का प्रेम से खाया।
सच्चे भक्त का मान बढ़ाया॥
37विदुराणी के छिलके खाए।
प्रेम वश कई स्वाद बताए॥
38मीराँ तारी, गनिका तारी।
एक एक गोप और गोपी तारी॥
39धन्धे भक्त का भोग लगाया।
ग्राह से गज को आप छुड़ाया॥
40गार्ड थे श्री वधावा राम।
मस्त अवधूत और रमता राम॥
दोहा
कुँवर कन्हैया हे गिरिधारी, करुणा के भंडार।
अविचल भक्ति दास को बख्शो, आया हूँ तेरे द्वार॥
॥ इति शुभम् भवतु ॥
॥ श्री युगल-कीर्तन-स्तुति ॥
जय राधे जय राधे राधे, जय राधे जय श्रीराधे।
जय कृष्णा जय कृष्णा कृष्णा, जय कृष्णा जय श्रीकृष्णा॥
श्यामा गोरी नित्य किशोरी, पीतम जोरी श्रीराधे।
रसिक रसीलो छैल छबीलो, गुणगरबीलो श्रीकृष्णा॥
रासविलासिनि रसविस्तारिनि, पियमुरधारिनि श्रीराधे।
नव नवरंगी नवलत्रिभंगी, श्याम सुअंगी श्रीकृष्णा॥
प्राणपियारी रूप उजारी, अति सुकुमारी श्रीराधे।
मैन मनोहर महामोदकर, सुन्दरवरतर श्रीकृष्णा॥
शोभाश्रेणी मोहा मैनी, कोकिल बैनी श्रीराधे।
कीरतिवंता कामिनिकंता, श्रीभगवंता श्रीकृष्णा॥
हंसा गमनी राजत रमनी, क्रीड़ा कमनी श्रीराधे।
रूपरसाला नयन विशाला, परम कृपाला श्रीकृष्णा॥
राधानामिनि गुणअभिरामिनि, हरिप्रियास्वामिनि श्रीराधे।
हरे हरे हरि हरे हरे हरि, हरे हरे हरि श्रीकृष्णा॥
॥ राधाकृष्णौ गतिर्मम ॥
कृष्ण प्रेमम्यी राधा राधा प्रेमम्यो हरि।
जीवने निधने नित्यं राधा कृष्णौ गतिर्मम॥
कृष्णस्य द्रविणं राधा राधाया द्रविणं हरिः।
जीवने निधने नित्यं राधा कृष्णौ गतिर्मम॥
कृष्ण प्राणम्यी राधा राधा प्राणम्यो हरि।
जीवने निधने नित्यं राधा कृष्णौ गतिर्मम॥
वृन्दावनेश्वरी राधा कृष्णो वृन्दावनेश्वरः।
जीवने निधने नित्यं राधा कृष्णौ गतिर्मम॥
॥ ॐ क्लीं श्रीराधिकायै स्वाहा ॥
श्रीराधा रासेश्वरी रम्या कृष्ण मन्त्राधि देवता।
सर्वाद्या सर्ववन्द्या च वृन्दावन विहारिणी॥
वृन्दाराध्या रमा शेष गोपी मण्डल पूजिता।
सत्या सत्परा सत्यभामा श्रीकृष्ण वल्लभा॥
वृषभानुसुता गोपी मूल प्रकृतिरीश्वरी।
गान्धर्वा राधिका रम्या रुक्मिणी परमेश्वरी॥
परात्परतरा पूर्णा पूर्णचन्द्र निभाननी।
भुक्ति मुक्ति प्रदा नित्यं भव व्याधि विनाशिनी॥
॥ श्री किशोरी जी की आरती ॥
जय जय श्रीराधा महारानी। जय---।
आदि शक्ति हो तुम्हीं जगत की, उमा रमा ब्रह्माणी। जय---।
सुर नर मुनि सेवत हैं निशिदिन, महिमा कोउ नहि जानी। जय---।
सुमिरत तोहि कटत भवबन्धन, होत सकल अघ हानी। जय---।
जो नर तेरो गान करत हैं, विमल होत है बानी। जय---।
पाप-ताप भवरोग नशावत, वेद-पुराण बखानी। जय---।
वृन्दावन विहरत तुम नित ही, भक्तन को वरदानी। जय---।
यमुना तट पर रास रचावत, मोद हृदय हर्षानी। जय---।
कहत सुजन वृषभानु लाड़ली, कृष्ण-प्रेम रस खानी। जय---।
मैं तो रटूँगी राधा नाम, बृज की गलियन में।
रहूँ खोई खोई आठों याम, बृज की गलियन में।
इत उत डोलूँ कह कह राधा, मिट जाये जीवन की व्याधा।
और मिल जायें घनश्याम, बृज की गलियन में॥
॥ जय जय श्रीराधे ॥
॥ श्री कन्हैया जी की आरती ॥
तुहाडी आरती मदन गोपाल, यशोदा दे लाल, मैं गावाँ कुञ्ज गली।
सिर पर सोहे मुकुट सुहाना, गल मोतियों के भूषण नाना।
तुहाडे गल है वैजयंती माल, यशोदा दे लाल, मैं गावाँ कुञ्ज गली।
मुख पर सोहे लटक निराली, झूमर झूमे जो बारंबारी।
तुहाडे होंठ ने लाल गुलाल, यशोदा दे लाल, मैं गावाँ कुञ्ज गली।
तुहाडी एह चितवन चित को चुरावे, साँवरी सूरत मन भरमावे।
तुहाडे कुण्डलाँ वाले ने बाल, यशोदा दे लाल, मैं गावाँ कुञ्ज गली।
आवो श्यामा देर न लावो, अपनियाँ भक्तान नूं दर्श दिखावो।
तुसीं आवो प्यारे नटवर लाल, यशोदा दे लाल, मैं गावाँ कुञ्ज गली।
॥ एक तुम मेरी ठौर ॥
आए हरि गुरु भेस में, उज्जवल ललित स्वरूप।
सतगुरु दीनानाथ हैं, मम तारक भवकूप॥
गुरुवर रव पदकज रज, सुवास प्रभास पुञ्ज।
लीला लाला लालि नित, चले रव हृदय कुञ्ज॥
भक्ति मञ्जरी मञ्जुला, अति ही सरस तिहारि।
डोल रही बन भँवरा, युगल प्रीति अति प्यारि॥
बाबा लाड़ लड़ा रहे, झरे मधुर मकरंद।
जय जय ऐसे संत की, पाई भक्ति अभंग॥
रुचिर मधुर रव रूप छवि, देखूँ मैं सब ओर।
दयावान तुमरी शरण, एक तुम मेरी ठौर॥
सर्व धाम गुरु चरण में, वृन्दावन गुरुदेव।
निर्जन वन उपवन करें, युगल प्रीत की नेव॥