॥ मंगलाचरण ॥
जय श्रीकृष्ण दया के सागर, त्रिभुवन के आधार।
सभी देव उपजाने वाले, जय जय नन्द कुमार।।
सब सृष्टियों के स्रष्टा हो तुम, घट घट के आधार।
तेरी महिमा वर्णी न जाये, जग के पालन हार।।
लिखने लगा चालीसा भगवन, बुद्धि दो दातार।
अपनी बुद्धि तो है बस कोरी, इसमें भरे विकार।।
इसीलिए तव कृपा माँगूँ, तू करुणा भण्डार।
ब्रह्मा भी तेरा अन्त न जाने, दास तो अति गंवार।।
॥ दोहा ॥
जय श्री कृष्ण दयालु भगवन, जय जय प्राणाधार।
अजर, अमर, अविनाशी हो तुम, पूर्ण ब्रह्म अवतार।।
सभी देवों के आदि कारण, सकल विश्व आधार।
तेरी महिमा कोई ना जाने, मेरे कृष्ण मुरार।।
अनादि, अनन्त, अजन्मा स्वामी, जय जय बखुशनहार।
ऐसी दृष्टि दास पे बख्शो, मिट जायें सभी विकार।।
॥ चौपाई ॥
जय श्रीकृष्ण गुणों के सागर।
सभी लोक तुम करो उजागर।।
जय वसुदेव देवकी नन्दन।
मात यशोधा और नन्द नन्दन।।
जय बंसीधर जय भगवन्ता।
तीन लोक के हो तुम कन्ता।।
जय मन मोहन कृष्ण मुरारे।
तू ने सारे असुर संहारे।।
जय जय तेरी दीन दयाला।
करुणा-सिन्धु अति कृपाला।।
जय माधव पीताम्बर धारी।
जय केशव जय जय बनवारी।।
जय नटवर गोवर्धन धारी।
कौरव दल और कंस संहारी।।
बाँके बिहारी जय गिरिधारी।
जय घनश्याम सुदर्शन धारी।।
मुरली मनोहर असुर निकंदन।
जय राधा वर जय ब्रज चन्दन।।
भक्त वत्सल श्याम मुरारे।
गोपियों के तुम प्राण आधारे।।
जय हो मेरे कुँवर कन्हैया।
जय हलधर के प्यारे भैय्या।।
गोपों के तुम सदा सहाई।
तेरी लीला लखी न जाई।।
साँवरे गिरिधर मदन गोपाला।
सारे जग के हो प्रतिपाला।।
सभी देवों के आदि कारण।
केवल तुम हो जग के तारण।।
तू निराकार तू ही साकारा।
सकल विश्व तेरे आधारा।।
सभी कला सम्पूर्ण स्वामी।
तेरी महिमा किसी न जानी।।
पूर्ण ब्रह्म जगदीश्वर स्वामी।
घट घट के हो अन्तर्यामी।।
ऋषि मुनि तेरा यश गावें।
तेरे दर पर शीश झुकावें।।
मैं भी वन्दना करूँ मुरारी।
श्यामवर्ण साधु हितकारी।।
नमस्कार गोवर्धन धारी।
वृन्दावन के रास विहारी।।
नमस्कार श्री दीना बन्धु।
कमल नयन और करुणा-सिन्धु।।
नमस्कार जग के पत वन्ता।
दीना नाथ सच्चे भगवन्ता।।
नमस्कार चहुँ ओर से स्वामी।
जगन्नाथ और अन्तर्यामी।।
नमस्कार सत् चित आनन्द।
दीन दयालु आनन्द कन्द।।
नमस्कार मुक्ति के दाता।
हे ब्रज रसिया जग के त्राता।।
नमस्कार अजन्म अनन्ता।
विश्वम्भर त्रिभुवन के कन्ता।।
नमस्कार त्रैकालिक नाथ।
द्वारकाधीश त्रिलोकी नाथ।।
नमस्कार पीताम्बर धारी।
प्रणतपाल और असुरारी।।
नमस्कार करोड़ों स्वामी।
रोम रोम और दिल से स्वामी।।
नमस्कार यह दास की सादर।
करो स्वीकार प्रभु गुण-सागर।।
हे ब्रज-भूषण नन्द दुलारे।
सूरदास के अति प्यारे।।
ध्रुव ने तेरी महिमा गाई।
अटल पदवी उस ने पाई।।
भक्त प्रह्लाद ने तुम्हें पुकारा।
नर सिंह रूप हो पापी मारा।।
द्रोपदी पर जब विपदा आई।
चीर बढ़ा कर हुए सहाई।।
नरसी भक्त की हुण्डी तारी।
जय मधुसूदन जय असुरारी।।
साग विदुर का प्रेम से खाया।
सच्चे भक्त का मान बढ़ाया।।
विदुराणी के छिलके खाए।
प्रेम वश कई स्वाद बताए।।
मीराँ तारी, गनिका तारी।
एक एक गोप और गोपी तारी।।
धन्ने भक्त का भोग लगाया।
ग्राह से गज को आप छुड़ाया।।
कच्चे तन्दुल खाने वाले।
द्विज के कष्ट मिटाने वाले।।
सदन कसाई तू ने तारा।
नन्दा नाई भक्त उबारा।।
नाम देव की प्यास बुझाई।
शरण पड़े की लाज बचाई।।
गार्ड थे श्री वधावा राम।
मस्त अवधूत और रमता राम।।
भक्ति में जब होश भुलाई।
गाड़ी उनकी आप चलाई।।
रण में अर्जुन हुआ अधीर।
तेरे ज्ञान से बान्धा धीर।।
वही ज्ञान गीता कहलाया।
जिस का यश दुनिया ने गाया।।
तेरे भक्त हैं तुझ को प्यारे।
कई रूप उन खातिर धारे।।
जब भक्तों पर विपदा आई।
हुए सहाई कुँवर कन्हाई।।
बड़े बड़े विद्वान मुनीश्वर।
योगीराज और ऋषि तपीश्वर।।
लिख-लिख ग्रन्थ तेरा यश गाया।
अन्त तेरा पर किसी न पाया।।
तेरी महिमा तू ही जाने।
न देवी न देव पहचाने।।
तेरा उदाहरण और न कोई।
तुझसे बढ़ कर बड़ा न कोई।।
सब जग तेरे माहीं समाया।
कोई न समझा तेरी माया।।
तेरी सब से ऊँची शान।
कुँवर कन्हैया हे भगवान।।
तू सृष्टि उपजाने वाला।
जग का पालन करने वाला।।
अन्त तू ही सब को संहारे।
तेरी माया के खेल न्यारे।।
तू अविनाशी सुख, का दाता।
तू सर्वेश्वर जग का त्राता।।
कण कण में है तू ही समाया।
फिर भी भेद किसी न पाया।।
तू ब्रह्मा उपजाने वाला।
तू शिव को हर्षिने वाला।।
तेरी शक्ति है जगदम्बा।
मात भवानी है जो अम्बा।।
राधा नाम जो कोई गावे।
कान्हा उसके वश हो जावे।।
राधा कृष्ण में अन्तर नाहीं।
सिद्ध यह बात सकल जग माहीं।।
राधा नाम है इतना पावन।
कन्हैया के भी मन को भावन।।
जो कोई राधा नाम है गाता।
कन्हैया को वह मन से भाता।।
तेरी शरण मैं आया राधे।
भव सागर से पार लगा दे।।
युगल-चरण की भक्ति दीजो।
इतनी कृपा मुझ पर कीजो।।
प्रवेश कराओ नित्य-लीला में।
बस जाओ अब मेरे मन में।।
युगल-दर्श के प्यासे नैना।
सुनाओ अपने मीठे बैना।।
ब्रज का वास मुझे अब दीजो।
अन्त मेरा अब वहाँ ही कीजो।।
स्वास स्वास अब तुझे रिझाऊँ।
ऐसी कृपा तेरी पाऊँ।।
तेरी शरण गुरु जी आया।
अब तुम पलटो मेरी काया।।
तेरे अर्पण जीवन सारा।
केवल तेरा मुझे सहारा।।
तेरे सहारे जीवन नैय्या।
तू ही मेरा एक खिवैया।।
रिश्ते की ही लाज बचा लो।
मेरे कन्हैया अब अपना लो।।
तू है मेरा प्राण सहारा।
तुझ बिन मेरा नहीं गुज़ारा।।
प्रेम-चिंगारी यूँ भड़का दो।
तन से ऊपर मुझे उठा दो।।
आमने सामने दर्शन दीजो।
केवल एक यह भिक्षा दीजो।।
सब कुछ इस में आ जायेगा।
जब तू सामने आ जायेगा।।
छोड़ तुम्हें अब कहाँ है जाना।
तुम बिन मेरा नहीं ठिकाना।।
मैं ने पाप किये बहु भारे।
तुम बिन कोई न मुझे उबारे।।
मुझ में भक्ति न है ज्ञान।
मूढ़ मति हूँ और अनजान।।
समदर्शी है तेरो नाम।
मुझे भी तारो जानूँ श्याम।।
भव सागर में डूब रहा हूँ।
काम क्रोध में है बस ध्यान।।
तू ही खिवैया बन कर मोहन।
कर दो अब मेरा कल्याण।।
सभी देव तेरा गुण गाते।
शीश झुका कर हैं हर्षिते।।
जो जन तेरे द्वारे आवे।
अपनी झोली भर ले जावे।।
मैं भी चाहूँ यह वरदान।
अन्त समय जब छोड़ूँ प्राण।।
उस वक्त किसी की याद न आए।
न कोई किसी का मोह सताए।।
सतगुरु मेरे पास खड़े हों।
सामने होवें राधे श्याम।।
इन्हीं का नाम ही लेते लेते।
निकल जायें बस मेरे प्राण।।
जो श्रीकृष्ण चालीसा गावे।
श्रद्धा से जो पढ़े पढ़ावे।।
प्रभु की भक्ति वह पा जावे।
अन्त मोहन उसका हो जावे।।
रोज़ जो कृष्ण चालीसा गावे।
सारी आयु नियम बनावे।।
तीन गुणों से रहे न्यारा।
जन्म मरण से हो छुटकारा।।